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बुंदेली गीत गोविंद
बुंदेली गीत गोविंद

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Category: Free Ebooks

Uploaded On: October 18,2014

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बुंदेली में गीतगोविंद अभी तक आया नहीं था, जिसकी लहरी में विद्यापति, सूरदास और अष्टछाप के मूर्धन्य साहित्यकारों का अभ्युदय हुआ। हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग माने गए भक्तिकाल का एक बड़ा हिस्सा गीतगोविंद की भावभूमि पर ही अवलंबित है। गीतगोविंद में श्रंगार और भक्ति का जो मणिकांचन संयोग हुआ है, उसे किसी अन्य बोली या भाषा में उतारना कवि के लिए अत्यंत दुष्कर है। भक्ति के विविध प्रकार हैं। भक्ति श्रंगार की ही अन्य रूप है और इसीलिए गीतगोविंद मुख्य रूप से श्रंगारी रचना है। इसमें श्रंगार रस के जिन संचारी भावों का वर्णन हुआ है, उसे किसी व्यक्ति द्वारा अभिव्यक्त करना भी लोकरीति के अनुकूल नहीं समझा जाता। गीतगोविंद के कवि जयदेव ने सैकड़ों-हजारों वर्ष पूर्व अपने इष्ट राधा-कृष्ण के रास-रूप के अंग-प्रत्यंग, भाव-अनुभाव को जो वाणी दी, उसे आज का समाज प्रचलित लोकरीति के कारण व्यक्त नहीं करता। अनुवादक ने इस लोकरीति का निर्वाह अपने उपास्य-उपासक भाव में रहते हुए मर्यादापूर्ण शब्दों में व्यक्त करते हुए किया है। जहां यदि रचना के मूल भाव को संरक्षित करने की विवशता के चलते कहीं शब्दों में खुलापन आया भी है तो उसमें उपास्य-उपासक भाव की प्रतिष्ठा पूर्णरूपेण सुरक्षित बनी हुई है।

हिंदी गीत काव्य अपनी परंपरा के लिये संस्कृत साहित्य का ऋणी है । वैदिक साहित्य के पश्चात् हमें जयदेव के गीत गोविंदम् में सर्वप्रथम गीतकाव्य का उन्नत एवं परिष्कृत रूप दिखाई देता है । यह ग्रंथ विद्यापति की पदवल्लरी और सूरदास एवं कृष्णकाव्यधारा के कवियों और भक्तों का प्रेरक बना । यही नहीं, वर्तमान में जो स्त्री विमर्श मुख्यधारा का साहित्य बना हुआ है, उसका उत्स भी इस ग्रंथ में पूर्ण काव्यत्व और लालित्य के साथ दृष्टव्य है

कनकनिकषरुचिशुचिवसनेन ।

श्वसिति न सा परिजनहसनेन ।।

सखि या रमिता वनमालिना ।।७-६।।



सोनें सौ पीतांबर हरि कौ मुरली तानें दै रइ।

पिय के संग संभोग खों सुनकें सखियां तानें दै रइं ।

तानें और मसखरी सुन कें आली तौउ हरस रइ।

बनमाली के संगै रैकें का हम घाइं तरस रइं।।

मुझे विश्वास है कि इस कृति के परंपरागत गीत और संगीत की लहरियों में कविर्मनीषी न केवल भावनिमग्न होंगे, अपितु वे इसे समसामयिक साहित्यिक स्थापनाओं और विमर्शों के आलोक में भी परखेंगे ।

Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

Binding Type : Ebook

Paper Type : creme

Language : Hindi

Category : Free Ebooks

Uploaded On : October 18,2014

अनुवादक - एक जुलाई छियालीस को जन्मे श्री बाबूलाल द्विवेदी शहरों में निवसित अपने पुत्र-पुत्रियों और उनके परिवारों के साथ न रहकर ललितपुर जनपद के लघु ग्राम छिल्ला (बानपुर) में रहकर ही साहित्य-साधना में लीन हैं। शायद ऐसे लोक अध्येताओं के लिए आधारभूत सामग्री के स्रोत आज भी ये गांव ही हैं। श्री द्विवेदी साहित्य के साथ-साथ कर्मकांड, दर्शन-आध्यात्म, पुराण-उपनिषद और आयुर्वेद चिकित्सा के भी मर्मज्ञ हैं। आपकी मनीषा नाना पुराण, निगमागम और स्वांतः सुखाय की तुलसी परंपरा की सतत प्रवाही है। आयुर्वेद से संबंधित आलेख धन्वंतरि इत्यादि पत्रिकाओं में तो बुंदेली और हिंदी भाषा के आलेख मनन, चिंतामणि, तुलसी साहित्य-साधना, सुधानिधि, कल्याण और उसके विशेषांकों में प्रकाशित हुए हैं। क्योंकि आपका प्रमुख कर्मक्षेत्र शुद्ध, सात्विक और संतोषी स्वभाव का पौरोहित्य है, पौरोहित्य में कोई अनुष्ठान और विधि क्यों संपन्न की जाती है, इसकी सचेष्टता के कारण आपने इस क्षेत्र में भी नई उद्भावनाएं की हैं। इसलिए संस्कृत भाषा का संस्कार स्वाभाविक रूप में आपकी भाषा-शैली में परिलक्षित होता है। उच्च शिक्षा की विभिन्न उपाधियों से आप वंचित रहे, पर स्वाध्याय और सत्संग से ज्ञान, वक्तृता, शोध और अनुभूतियों की जिन ऊंचाइयों को आपने उपलब्ध किया, उसे देखकर अच्छे पारखी और विद्वान आपकी नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा का लोहा मानते हैं।

प्रकाशित कृति - बानपुर विविधा, भइया अपने गांव में ( बुंदेली काव्य)

पुरस्कार- अवधेश पुरस्कार, मनियादेव पुरस्कार, अखिल भारतीय बुंदेली साहित्य एवं संस्कृति पुरस्कार

संपादक डा राकेश नारायण द्विवेदी, वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर, हिंदी, गांधी महाविद्यालय, उरई
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