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Jeevan Geet Ban Jaye
Jeevan Geet Ban Jaye

Ebook : 50 INR     Paperback : 230 INR

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ISBN : 978-93-86352-34-7

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Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

ISBN : 978-93-86352-34-7

Number of Pages : 236

Weight : 200 gm

Binding Type : Ebook , Paperback

Paper Type : Cream Paper(58 GSM)

Language : Hindi

Category : Poetry

Uploaded On : February 14,2017

Partners : Purchasekaro.com , Markmybook , Flipkart

डाॅ. महेन्द्रभटनागर की पुस्तक ‘जीवन गीत बन जाए पढ़कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। महेन्द्रभटनागर जी ने प्रेमचंद के जीवन-दर्शन और मानवतावादी पक्ष का बहुत उत्तम विश्लेषण किया है। वे मानते हैं, “प्रेमचंद मानवतावादी लेखक थे। गांधीवादी या साम्यवादी सिद्धान्तों से उन्होंने सीधी प्रेरणा ग्रहण नहीं की। उन्होंने जो कुछ जाना, सीखा, लिया; वह सब अपने अनुभव मात्र से। इसीलिए उनके साहित्य में अपरास्त शक्ति है। गांधीवाद और साम्यवाद कोई मानवता के विरोधी नहीं हैं। अतः प्रेमचंद के विचारों में जगह-जगह दोनों की झलक मिल जाती है। लेकिन उनका मानवतावाद सर्वत्र उभरा दीखता है। यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं कि प्रेमचंद पूर्णरूप से मानवतावादी थे। उनके उपन्यासों में और लेखों में जड़-सम्पत्ति मोह-चाहे वह परम्परागत सुविधा के रूप में हो, जमीदारी या महाजनी वृत्ति का परिणाम हो, या उच्चतर पेशों से उपलब्ध हो - मानव की स्वाभाविक सद्वृत्तियों को रुद्ध करता है। प्रेमचंद ने सचाई और ईमानदारी को मनुष्य का सबसे बड़ा उन्नायक गुण समझा है। प्रेम उनकी दृष्टि में पावनकारी तत्त्व है। जब वह मनुष्य में सचमुच उदित होता है तो उसे त्याग और सचाई की ओर उन्मुख करता है। महेन्द्रभटनागर जी ने बड़ी कुशलतापूर्वक प्रेमचंद की इस मानवतावादी दृष्टि का विश्लेषण किया है। उनका यह कथन बिल्कुल ठीक है कि प्रेमचंद ने औद्योगिक नैतिकता का वर्णन कर उद्योगपतियों की मनोवृत्ति के विरुद्ध जन-मत तैयार किया है।’ उन्होंने उस मूक जनता का पक्ष लिया है जो दलित है, शोषित है, और निरुपाय है। पुस्तक में प्रेमचंद के उपन्यासों और लेखों से उद्धरण देकर उन्होंने इस बात का स्पष्टीकरण किया है।

प्रेमचंद जी साहित्य सर्जक थे। उन्होंने केवल पात्रों के मुँह से ही विचार नहीं व्यक्त किये हैं बल्कि पात्रों और घटनाओं के जीवन्त गतिमय संघटना के द्वारा अपने मत की व्यंजना की है। महेन्द्रभटनागर जी ने इस पहलू पर ध्यान नहीं दिया है। वे सीधे प्रेमचंद की कलम से निकले हुए विविध प्रसंगों दे उद्-गारों से ही अपने वक्तव्य का समर्थन करते हैं। उनके निष्कर्ष स्वीकार योग्य हैं, परन्तु साहित्य के विद्यार्थी की सभी जिज्ञासाओं को वे संतुष्ट नहीं करते। ऐसा जान पड़ता है कि समस्याओं का रूप स्पष्ट करके प्रेमचंद के उद्गारों से उनके समाधान की ओर इंगित करना ही उनका लक्ष्य है। इस कार्य को उन्होने बड़े परिश्रम और कौशल से सम्पन्न किया है। इस दिशा में उनका प्रयत्न सफल हुआ है।
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