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 Jogi Ji Waah
 Jogi Ji Waah

Ebook : 30 INR     Paperback : 140 INR

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ISBN : 978-93-86352-16-3

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हैं दुख पर्वत से, ख़ुशियाँ जैसे राई
मैं पत्थर हो गया था मेरे भाई
हुआ फिर यूँ कि मैं बच्चों में बैठा
हँसी मुझको बहुत दिन बाद आई।

Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

ISBN : 978-93-86352-16-3

Number of Pages : 120

Weight : 145 gm

Binding Type : Ebook , Paperback

Paper Type : Cream Paper(58 GSM)

Language : Hindi

Category : Poetry

Uploaded On : February 6,2017

Partners : Amazon , Snapdeal , Payhip , Kraftly , Purchasekaro.com , Smashwords , Flipkart , Kobo , google play , Markmybook , pustakmandi.com

डाॅ० सुनील जोगी हिन्दी के सुविख्यात कवि एवं साहित्यकार

हैं। मैं लगभग बीस वर्षो से उनके लेखन और काव्य कौशल का साक्षी

रहा हूँ। वे मेरे बहुत प्रिय और आत्मीय हैं। उनकी एक कविता ‘ढोल

के भीतर पोल मिलेगा, आने वाली पीढ़ी को‘ मेरी पसंदीदा कविता

है। कवि भविष्यदृष्टा होता और समाज की दशा और दिशा बताने का

काम करता है। आज जोगी पद्मश्री हैं, हिन्दुस्तानी एकेडमी के अध्यक्ष

हैं और देश विदेश के बहुत लोकप्रिय कवि हैं। यह सब देखकर मुझे

प्रसन्नता होती ह।ै उनमे ं महे नत, लगन और समर्पण की भावना सदा

से रही है।

सुनील का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे गद्य और पद्य पर

समान अधिकार रखते हैं। गीत, ग़ज़ल, भजन, हास्य व्यंग्य सब उनकी

लेखनी से सहज प्रस्फुटित होता है। उनकी नई पुस्तक शायरी की

आ रही है जिसके लिए मैं उन्हे ं अनन्त शुभकामनाएँ दते ा हूँ वे और

अधिक सृजनशील और यशस्वी हो।ं ऐसी प्रभु से प्रार्थना है।

जय हो!
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