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ISBN : 8182-1208-96

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बेताल ने कहा (कथा संकलन) बदलते सामाजिक मानदण्डों के प्रति सामज में जाग्रति पैदा करने के उद्देश्य से लिखी गई यह कहानियाँ साधनों की पवित्रता के प्रति उपेक्षाभाव के साथ आयी सफलताओं से उत्पन्न अराजकता के प्रति समाज को आगाह करती है। डा0 शिवजी श्रीवास्तव के अनुसार इन कहानियों में प्रयुक्त भाषा और शिल्प की प्रहारक क्षमता परसाई जी की याद दिलाती है।’’ उनके अनुसार ^^अमृतराय ने जिस कथा-रस को कहानी के लिए आवश्यक माना है वह कथा रस इस संकल की समस्त कहानियों में विद्यमान है। एक और विशेषता इन कहानियों की है। वह है इनका शिल्पगत प्रयोग, नई कहानी के पश्चात बहुत कम कथाकार ऐसे है जिन्हें शिल्प के माध्यम से पहचाना जा सकता है। ज्ञानेश यह पहचान बनाते नजर आते हS । बेताल के माध्यम से बात कहने की कला ज्ञानेश को एक अलग पहचान दिलाती है।’’

Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

ISBN : 8182-1208-96

Number of Pages : 96

Weight : 300 gm

Binding Type : Ebook , Paperback

Paper Type : Cream Paper(58 GSM)

Language : Hindi

Category : Novel

Uploaded On : November 19,2016

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डाॅ. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित के अनुसार ‘कुल्हाड़ी कथ्य और शिल्प की पहाड़ी यात्रा के बीच कवि ज्ञानेश श्रीवास्तव का श्रमजीवी चिन्तन वैज्ञानिक यथार्थ की भाँति अर्थसिद्धि देगा। डाॅ. उदयवीर शर्मा ज्ञानेश को ‘लकीर का फकीर न मानकर मनमस्ती और हस्ती का कवि मानते हैं। श्री रमेश कुमार मिश्र ‘सिद्धेश को ‘ज्ञानेश की कविताएँ केंचुल से निकली नागिन सी ताज़ी-टटकी और आकर्षक लगती हैं। ख्याति प्राप्त वयोवृद्ध कवि बाबू केदानाथ अग्रवाल ज्ञानेश की ‘कविताओं में अकेले डूबकर थाह पाने में अपने को असमर्थ पाते हैं। डाॅ. हरिमोहन को ‘ज्ञानेश की कविताएँ छद्म-प्रगतिवाद से अलग ईमानदार प्रगतिशील स्वर लिये हुए पाठक को रचनात्मक युद्ध के लिए तैयार करने की कोशिश में संलग्न दिखाई पड़ती हैं। जबकि डाॅ. मथुरेश नन्दन कुलश्रेष्ठ को ज्ञानेश की ‘काव्य पंक्तियाँ जीवन की सहज एवं अपरिहार्य गति को प्रस्तुत करते हुए जीवन के प्रति आस्था व्यक्त करती लगती हैं। उन्होंने ज्ञानेश की कविताओं को वैयक्तिकता की परिधि की परिधि तोड़कर सार्वजनिक अनुभूति का रूप ग्रहण करते हुए देखा है। डाॅ. अजय तिवारी के अनुसार ‘ज्ञानेश की काव्य भाषा शीतल, सौरभी और अपरूप चितवन के ज़रिये काफ़ी रोमानी मनःस्थिति में चली जाती है। स्वर्गीय कैलाश कल्पित के अनुसार ‘ज्ञानेश अपनी कविताओं में शब्दों के आडम्बर नहीं लादते। वह सहज-सरल शब्दों में धीरे से एक अनुभूति व्यक्त कर देते हैं।
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