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Yo Maa Pratibalo Loke
Yo Maa Pratibalo Loke

    Paperback : 200 INR

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ISBN : 818212042-X

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यो मा प्रतिबलो लोके (उपन्यास ) -प्रसिद्ध धार्मिक आख्यान ^श्री दुर्गा सप्तसती’ के पंचम अध्याय में भगवती दुर्गा के उद्घोष वाक्य यो मा प्रतिबलो लोके” नामक यह उपन्यास अपने शीर्षक के अनुकूल स्त्री-पुरूष अन्तसम्बन्धों को स्थायित्व प्रदान करने वाली शारीरिक मानसिक संरचनाओं की जैव-भैतिक पड़ताल अत्यन्त प्रामणिकता से प्रस्तुत करता है। यौन विमर्श पर जैविक-संरचना,W मनोवैज्ञानिक, चिकित्सकीय निर्कषों की सामाजिक एवं धार्मिक भावभूमि पर इस सरस औपन्यासिक प्रस्तुति द्वारा समाज में व्याप्त अनेक रूढ़ियों और थोथी मान्यताओं का बड़ी निर्ममता से पोस्टमार्टम कर यर्थाथ नवीन मान्यताओं को स्थापित करने की दृष्टि विकसित करने का प्रयास किया गया है। उपन्यास परिवार के बिखराव में केन्द्रीभूत यौन-असमर्थता-जन्य असन्तुष्टि को रेखांकित कर उसके प्रति समाज को सचेत करने का कार्य तो करता ही है, एड्स जैसी महामारी के कारणों का अन्तरंग विश्लेषण प्रस्तुत कर उसके बचाव हेतु समाज को अभिप्रेरित भी करता है।

Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

ISBN : 818212042-X

Number of Pages : 224

Weight : 400 gm

Binding Type : Paperback

Paper Type : Cream Paper(58 GSM)

Language : Hindi

Category : Novel

Uploaded On : November 19,2016

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डाॅ. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित के अनुसार ‘कुल्हाड़ी कथ्य और शिल्प की पहाड़ी यात्रा के बीच कवि ज्ञानेश श्रीवास्तव का श्रमजीवी चिन्तन वैज्ञानिक यथार्थ की भाँति अर्थसिद्धि देगा। डाॅ. उदयवीर शर्मा ज्ञानेश को ‘लकीर का फकीर न मानकर मनमस्ती और हस्ती का कवि मानते हैं। श्री रमेश कुमार मिश्र ‘सिद्धेश को ‘ज्ञानेश की कविताएँ केंचुल से निकली नागिन सी ताज़ी-टटकी और आकर्षक लगती हैं। ख्याति प्राप्त वयोवृद्ध कवि बाबू केदानाथ अग्रवाल ज्ञानेश की ‘कविताओं में अकेले डूबकर थाह पाने में अपने को असमर्थ पाते हैं। डाॅ. हरिमोहन को ‘ज्ञानेश की कविताएँ छद्म-प्रगतिवाद से अलग ईमानदार प्रगतिशील स्वर लिये हुए पाठक को रचनात्मक युद्ध के लिए तैयार करने की कोशिश में संलग्न दिखाई पड़ती हैं। जबकि डाॅ. मथुरेश नन्दन कुलश्रेष्ठ को ज्ञानेश की ‘काव्य पंक्तियाँ जीवन की सहज एवं अपरिहार्य गति को प्रस्तुत करते हुए जीवन के प्रति आस्था व्यक्त करती लगती हैं। उन्होंने ज्ञानेश की कविताओं को वैयक्तिकता की परिधि की परिधि तोड़कर सार्वजनिक अनुभूति का रूप ग्रहण करते हुए देखा है। डाॅ. अजय तिवारी के अनुसार ‘ज्ञानेश की काव्य भाषा शीतल, सौरभी और अपरूप चितवन के ज़रिये काफ़ी रोमानी मनःस्थिति में चली जाती है। स्वर्गीय कैलाश कल्पित के अनुसार ‘ज्ञानेश अपनी कविताओं में शब्दों के आडम्बर नहीं लादते। वह सहज-सरल शब्दों में धीरे से एक अनुभूति व्यक्त कर देते हैं।
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