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Prem Chandra
Prem Chandra

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Category: Nonfiction

Uploaded On: February 13,2016

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डा. महेन्द्रभटनागर ने प्रेमचंद के जीवन-दर्शन और मानवतावादी पक्ष का बहुत उत्तम विश्लेषण किया है। वे मानते हैं कि ‘‘ प्रेमचंद मानवतावादी लेखक थे। गांधीवादी या साम्यवादी सिद्धान्तों से उन्होंने सीधी प्रेरणा ग्रहण नहीं की। उन्होंने जो कुछ जाना, सीखा, लिया; वह सब अपने अनुभव मात्र से। इसीलिए उनके साहित्य में अपरास्त शक्ति है। गांधीवाद और साम्यवाद कोई मानवता के विरोधी नहीं हैं; अतः प्रेमचंद के विचारों में जगह-जगह दोनों की झलक मिल जाती है। लेकिन उनका मानवतावाद सर्वत्र उभरा दीखता है।’’ यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं कि प्रेमचंद पूर्णरूप से मानवतावादी थे। उनके उपन्यासों में और लेखों में जड़-सम्पत्ति मोह चाहे वह परम्परागत सुविधा के रूप में हो, ज़मीदारी या महाजनी वृत्ति का परिणाम हो, या उच्चतर पेशों से उपलब्ध हो — मानव की स्वाभाविक सद्-वृत्तियों को रुद्ध करता है। प्रेमचंद ने सचाई और ईमानदारी को मनुष्य का सबसे बड़ा उन्नायक गुण समझा है। प्रेम उनकी दृष्टि में पावनकारी तत्त्व है। जब वह मनुष्य में सचमुच उदित होता है तो उसे त्याग और सचाई की ओर उन्मुख करता है। महेन्द्रभटनागर जी ने बड़ी कुशलतापूर्वक प्रेमचंद की इस मानवतावादी दृष्टि का विश्लेषण किया है। उनका यह कथन बिल्कुल ठीक है कि ‘‘ प्रेमचंद ने ‘औद्योगिक नैतिकता’ का वर्णन कर उद्योगपतियों की मनोवृत्ति के विरुद्ध जन-मत तैयार किया है।’’ उन्होंने उस मूक जनता का पक्ष लिया है जो दलित है, शोषित है, और निरुपाय है। पुस्तक में प्रेमचंद के उपन्यासों और लेखों से उद्धरण देकर उन्होंने इस बात का स्पष्टीकरण किया है। उनके निष्कर्ष स्वीकार योग्य हैं। प्रेमचंद के विचारों को उन्होंने बड़ी स्पष्टता और दृढ़ता के साथ व्यक्त किया है। मुझे आशा है कि साहित्य-रसिक और समाज-सेवी इससे समान रूप से आनन्द पा सकेंगे। हमारे देश की बहु-विचित्र समस्याओं का इसमें उद्घाटन हुआ है और प्रेमचंद जैसे मनीषी का दिया हुआ समाधान इससे स्पष्ट हुआ है।
— हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

Edition : 1

Weight :

Binding Type : Ebook

Paper Type : Cream Paper(70 GSM)

Language : Hindi

Category : Nonfiction

Uploaded On : February 13,2016

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