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Manushya mein moolyo  ka parivartan
Manushya mein moolyo  ka parivartan

Ebook : 90 INR

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ISBN : 978-93-85818-00-4

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आज का हमारा समाज अनगिनत समस्याओ से जूझ रहा है। वर्तमान समाज में भ्रष्टाचार, स्वार्थ, घमण्ड तथा दूसरो के प्रति र्इष्र्या आदि बुराइया अपनी चरम सीमा पर है। यहा तक की सामाजिक सम्बन्धों में भी घमण्ड व स्वार्थ की गन्ध आने लगी है। समाज के प्रत्येक व्यकित में स्वार्थ और घमण्ड की भावना व्याप्त हो गयी है। कुछ मनुष्यो में यह भावना प्रबल होती है। तो कुछ मनुष्यों में यह भावना निर्बल होती है। वर्तमान समाज में मनुष्य एक दूसरे के ऊपर अपना अधिपात्य जमाना चाहता है। यही भावना समाज में भ्रष्टाचार को जन्म देती है। सामाजिक सम्बंधो में जैसे (मेरे शत्रु का शत्रु मेरा मित्र है) की कहावत चरितार्थ होती नजर आ रही है। स्वार्थ तो जीवन के प्रत्येक क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभा रहा है। वर्तमान समाज में परार्थ की जगह स्वार्थ, घमण्ड, हिंसा, आतंकवाद, जातिवाद, अन्र्तजातीय संघर्ष तथा र्इष्र्या आदि का बोलबाला हो रहा है। आज समाज कठिन अवस्था से गुजर रहा है। वर्तमान समाज में मनुष्य एक दूसरे के प्रति र्इर्या-द्वेष की भावना रखता है। मनुष्य अपनी कमियो को न देखते हुए दूसरे के कमियों को निकालता है, और आलोचनाये करता रहता है।
समाज परिवर्तन शील है। समाज के मौलिक मूल्य बहुत कुछ बदल गये है। जहा कुछ परिवर्तन समाज के लिये अनुकूल प्रतीत हो रहे है, और कुछ परिवर्तन प्रतिकूल तथा कुछ परिवर्तन घातक भी है। समाज में बुराइयों की जड़े इतनी गहरी हो चुकी है, कि इन जड़ो को काटना ना मुमकिन तो नही मुशिकल जरूर है।वर्तमान समाज में इन बुराइयो ने एक रूढ़ीवादी परम्परा का स्थान ले लिया है। जिस प्रकार हमारे देश की संस्कृति देश की धरोहर मानी जाती है, और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं। उसी प्रकार ये बुराइया पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है।
मनुष्य में येे बुराइया कहा से आ जाती है? मनुष्य में ये बुराइया कैसे आ जाती है? क्या वास्तव में मनुष्य घमण्डी होता है, या क्या वास्तव में मनुष्य स्वार्थी होता है? क्या वास्तव में मनुष्य के स्वभाव में बुराइया होती है? मनुष्य बुरा होता है।

Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

ISBN : 978-93-85818-00-4

Number of Pages : 184

Binding Type : Ebook

Paper Type : Cream Paper(58 GSM)

Language : Hindi

Category : Human Nature

Uploaded On : September 30,2015

Customer Reviews
  • Manisha Sahu

    nice book

  • Ramesh Thakur

    niraj ji, aap ki kitab muje bahut pasand aai, dhanyavaad

  • Rita Rai

    how can i get this book in paper back format?

  • shubhra

    Great one bought an online copy and still in the process of reading

Ebook : 90 INR

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