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हा जीवन! हा मृत्यु!
हा जीवन! हा मृत्यु!

    Paperback : 329 INR

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दिव्या माथुर की रचनाधर्मिता की क्षमता को आत्मीयता से मैंने तब जाना जब मैं लंदन स्थित नेहरु सेंटर में प्रवास कर रहा था और वह मेरे साथ कार्यरत थीं। वहाँ मैंने अनेक प्रवासियों के अंदर अपनी संस्कृति को जीने की ललक तथा उसे बटोरने की उत्कट आकांक्षा देखी। कवयित्री दिव्या भी अपनी संस्कृति को सहेजने में अनवरत रूप से जुटी हैं और इस क्रम में लोगों को लोगों से भारत को भारतीयता से और सभी को संस्कृति से अलग अलग उपक्रमों द्वारा जोड़ रहीं हैं। इस शैली में वह अधिकारी से अधिक समर्पित संस्कृतिकर्मी नज़र आती हैं। उनका सृजन संस्कृति को सहेजने का एक खूबसूरत माध्यम है और उनके सातों कविता-संग्रह, पांचो कहानी संग्रह और हाल ही में रचित पहला उपन्यास, उसी का सार्थक प्रतिफल है।


जीवन और मृत्यु पर आधारित रचनाओं के इस संग्रह में कोई ऐसा रंग नहीं है जिसे दिव्या पकड़ने में सफल न रही हो।



फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं, फिर वही ज़िंदगी हमारी है|


बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है||


पवन कुमार वर्मा


बिहार के मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार


पूर्व निदेशक, नेहरु केंद्र, लन्दन


पूर्व महानिदेशक भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, दिल्ली

Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

Number of Pages : 190

Weight : 220 gm

Binding Type : Paperback

Paper Type : creme

Language : Hindi

Category : Poetry

Uploaded On : January 30,2015

Partners : Flipkart , shopclues , google play , scribd , Rockstand.in

रौयल सोसाइटी औफ़ आर्ट्स की मनोनीत फ़ेलो, दिव्या माथुर वातायन कविता संस्था की संस्थापक हैं.



भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के नेत्र-विभाग में वरिष्ठ चिकित्सा-आशुलिपिक (1971-1985), भारतीय उच्चायोग-लंदन में वरिष्ठ अधिकारी (1985-92, 2012-14) और नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम-अधिकारी (1992-2012) के पदों पर कार्य कर चुकीं दिव्या माथुर का लन्दन के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी अपूर्व योगदान रहा है.


कहानी संग्रह: 'हिन्दी@स्वर्ग.इन', 'मेड इन इंडिया', '2050 और अन्य कहानियाँ', 'पंगा और अन्य कहानियाँ' एवं 'आक्रोश और अन्य कहानियां'.


कविता संग्रह: अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी, 11 सितम्बर: सपनों की राख तले, और झूठ, झूठ और झूठ.


अंग्रेज़ी में संपादन: 'औडिसी: विदेशों में बसी भारतीय लेखिकाओं की कहानियां', 'आशा: भारतीय लेखिकाओं की कहानियां' एवं 'इंडिया-बोर्न: यू.के. में बसी भारतीय लेखिकाओं की कहानियां.'


अनुवाद : नैशनल फ़िल्म थियेटर द्वारा प्रस्तुत सत्यजित रे रेट्रो के लिए अनुवाद, बीबीसी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर और मंत्रा-लिंगुआ के लिए बच्चों की पांच पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद, दिव्या की भी रचनाओं का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.


पुरस्कार/सम्मान: डॉ हरिवंश राय बच्चन लेखन सम्मान, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी पुरस्कार, आर्टस काउंसिल औफ़ इग्लैंड का कला-साधना-सम्मान-2003 (कला की नवरचना में उत्कृष्ट योगदान), कथा यू.के. का पदमानंद साहित्य सम्मान, एन.आर.आई. भारत-सम्मान, चिन्मोय मिशन का वैयक्तिक उत्प्रेरणा और समर्पण सम्मान, यू.के हिंदी समिति का संस्कृति सेवा सम्मान, अक्षरम का प्रवासी हिन्दी साहित्य सम्मान, अनुभव-निकाय द्वारा समाज सेवा में योगदान के लिए पुरस्कृत, इंटरनैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोइटरी से पुरस्कृत इनकी कविता, बौनी बूंद, पोइम्स फ़ौर दि वेटिंग रूम में भी सम्मलित. एशियन वीमेन ऐचिव्मैन्ट अवार्ड - प्रेरणात्मक एशियन महिला मनोनीत.
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  • Pari Vikram

    good book

  • Manisha Sahu

    acchi kitab hai

  • Ramesh Thakur

    nice book

  • Sumit Srivastava

    purcahsed a online copy it was a superb write up divya ji , thank you very much

  • shubhra

    it was greta to be a part of this book again divya ji!!

Paperback : 329 INR

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