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चौकीदार चॊर बन जाये by Ram Singh
चौकीदार चॊर बन जाये
चौकीदार चॊर बन जाये

    Paperback : 500 INR

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���चौकीदार चोर बन जाय�...

Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

Weight : 350 gm

Binding Type : Paperback

Paper Type : creme

Language : Hindi

Category : Fiction

Uploaded On : May 12,2014

30 सितम्बर, सन 1944 को एक सामान्य कृशक परिवार में जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही मेधावी तथा जिज्ञासु प्रवृतित रही। स्थानीय कुरसथ से प्राइमरी तथा जूनियर तक की परीक्षा अच्छे अंकों में उत्तीर्ण करके कुरसथ से 11 किमी0 दूर गौसगंज ग्राम में सिथत पी0बी0आर इण्टर कालेज से प्रथम श्रेणी में विषिश्ट योग्यता के साथ हार्इस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उच्चतर षिक्षा के लिये लखनऊ आये। सन 1965 में अंग्रेजी में एम0ए0 करने के बाद केन्द्र सरकार के डाक विभाग में सेवा 1966 में प्रारम्भ की।



साहितियक अभिरूचि-:



साहितियक अभिरूचि होने के कारण तथा माता-पिता से लगाव होने के कारण डाक विभाग से इस्तीफा देकर क्रिषिचयन कालेज लखनऊ में एल0टी0 का प्रषिक्षण से एल0टी0 का प्रषिक्षण प्राप्त किया। तदनन्तर जुलार्इ 11, 1972 से 30 जून, 2007 तक अपने जन्म स्थान से 11 किमी0 दूर पी0बी0आर0 इण्टर कालेज तेरवा गौसगंज में अंग्रेजी प्राध्यापक के रूप में षिक्षण कार्य सफलतापूर्वक किया।

गौसगंज कालेज में षिक्षण के दौरान ही हिन्दी तथा दर्षनषास्त्र में भी स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त कर ली। यों तो बाल्य-काल से ही काव्य-रचना करना प्रारम्भ कर दिया था किन्तु काव्य में प्रौढ़ता और गाम्भीर्य षिक्षण के दौरान आया। विधालय के किसी भी कार्यक्रम में छात्र और षिक्षक कवितायें सुनने के लिये उत्सुक रहा करते थे।



विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों को अध्ययन के बाद उन पर गहन चिन्तन और मनन करके भारतीय समाज में फैली विशमतावादी मानसिकता के विरूद्ध सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन की चेतना पैदा हो गयी। समाज में फैले अन्ध विष्वास जन्य मानसिक दासत्व को जड़ र्इष्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग नर्क जैसे काल्पनिक मनगढ़न्त प्रत्ययों को क्या, क्यो, कैसे, किस लिये जैसे प्रष्नों की तर्क की कसौटी पर कसकर वैज्ञानिक दृशिटकोण जन-मानस में पैदा करने का दायित्व अपनी लेखनी द्वारा संभाल लिया। आज लोग र्इष्वर और धर्म के नाम पर आम आदमी की आस्था और श्रद्धा का दोहन करते हैं जिसकी वजह से चतुर-चालाक लोग मेहनतकष का भरपूर षोशण करते हैं।



पुरानी मान्यताओं तथा जीवन मूल्यों को आज के युग में मानव हित में पुनर्निधारण करना ही क्रानित है तथा मानव हित में विवेक बुद्धि का प्रयोग ही धर्म है। जनवादी अथवा मानवतावादी साहित्य का लेखन करते हुए आम आदमी तथा नारी वर्ग को सम्मान, सुरक्षा, सम्पतित और स्वाभिमान समता से जीवन जीने हेतु संवैधानिक मौलिक अधिकारों का प्रभावषाली चित्रण लेखों और कविताओं में करके जन-मानस को सजग किया गया है।



काव्य तथा लेख-:



पूरा साहित्य (काव्य तथा लेख) बिना जाने मान लेने की रूंध-श्रद्धा वाली प्रवृतित को दूर तक ”पहले जानों फिर मानो की तार्किकक एवं वैज्ञानिक विचार धारा कर प्रभावी ढंग से प्रतिपादन करता है।
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  • Ram Singh Premi

    please esko padkar apne comments de ....

Ebook : 300 INR

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