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Ebook : 49 INR     Paperback : 149 INR

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ISBN : 978-93-89615-40-5

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‘‘भूलना हमारे बस में नहीं, फिर भी कोशिश को तवज्जो दिये हैं। आथ्खों में कैद हैं सपने, फिर भी जीने की उम्मीद किये हैं।।’’ कुछ पन्ने कभी-कभार ज़िन्दगी को , ऐसी तल्खी दे देते हैं कि हम सोच भी नहीं पाते और दिल जेहन आपस में बातें करने लगते हैं। क्या हुआ था जो हम नसीब को कोसते चलते गये, क्या हुआ जो हम एक सवाल को भी तरसते रह गये । सपना था गर तो क्यों सपना था क्यों नहीं उसका अक्स हमारा हमसफर बन पाया। ख्यालों की दीवार किसी लम्बी होती है, परछाईयाँ क्यों नहीं अपनी हो पाती हैं, निगाहों की खुश्की को अश्क क्यों नहीं नसीब होता है, क्या ये निगाहें फिर से वीरान जंगल बन जायेगी । जिसकी दरख्ते सावन की एक बूँद की प्यासी बन जाती है सोचती है कि कोई तो एक बूँद आयेगी और हमें अपना बना लेगी । आईने के साथ सपने पिरोती मनमोहक भाव में डूबी भावना उस खुशी का इन्तजार कर रही थी जो कभी उसने सपने में देखा था। सुबह के उगते सूरज को देखकर सोचने लगी न जाने कब मेरी ज़िन्दगी का ये अँधेरा खत्म होगा और सुबह होगी । कायदे की दरो-दीवार में जकड़े मेरे ख्याल कब खुले आकाश में साँस लेंगे ? कब कोई साया साथ रहकर भी आजादी का एहसास करायेगा? इन्तजार करना मेरी किस्मत तो नहीं जो हर ख्वाब इन्तजार का एहसास दिलाता है। वजूद में एक मीठा जहर घुलने लगे हैं कि दिल कहता है अब बस!! सपनों को अब तो एक साकार जमीन चाहिए कोई तो आँखों के काजल में छुपे अश्कों को खुशी का वजूद देता और कहता ‘‘जी तो जरा’’!!!

Publisher : Onlinegatha

Edition : 1

ISBN : 978-93-89615-40-5

Number of Pages : 113

Binding Type : Ebook , Paperback

Paper Type : Cream Paper(70 GSM)

Language : Hindi

Category : Poetry

Uploaded On : October 24,2018

Partners : Amazon , Flipkart

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paperback
149 INR / $
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  • BHARAT LAL Vishwakarma

    Nice book

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